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रायबरेली-काश ! वो बचपन की आजादी,ईद स्पेशल- पर पेश है के.डी.न्यूज़ से “हिमांशु शुक्ला”की रिपोर्ट

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ईद स्पेशल- पर पेश है के.डी.न्यूज़ से “हिमांशु शुक्ला”की रिपोर्ट

काश ! वो बचपन की आजादी, ईद पर फिर मिल जाती।

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रायबरेली : बचपन के दिनों को कौन नहीं याद करता। सचमुच खुशियों का सबसे बेहतर पल बचपन वाला ही होता है। त्यौहार कोई भी हो, बच्चों की खुशियों का ठिकाना नहीं रहता। ईद पर मिलने वाली ईदी बच्चों के लिए खजाना समझिए। नए कपड़े पहनकर खिलखिलाते ईदगाह जाना, वहां पर मेले का लुत्फ उठाना। बिना रोकटोक के सहेलियों के घर-घर घूम व्यंजन चखने के साथ ही साथ बड़ों से मिलने वाली ईदी अब बहुत याद आती है। मजहबी त्योहार में अपने से बड़ों को सलाम करना और उनका आशीष लेकर खुश होना। एकत्र किए गए पैसों से खिलौने खरीदना, झूले का लुत्फ उठाना। उन सुनहरे दिनों की यादें आज भी जवां है। ईद की तैयारियों में मशगूल मुस्लिम महिलाओं से बातचीत की तो उनकी आंखों में पुरानी चमक देखने को मिली और वे बचपन की यादों में मानों कुछ पल के लिए खो गई हों।

कोट

आज भी याद है हर लम्हा

बरईपुर की सुरैया बेगम बताती है कि बचपन की ईद का हर लम्हा आज भी याद है। इसकी तैयारियां रमजान माह की शुरुआत से कर देती थी। भाई, वालिदैन से पसंद के कपड़े के साथ मैचिग ज्वेलरी की डिमांड रखना, दुकानों में मां के साथ जिद करके सामान लेना, ईद के दिन पहले से ही ईदी की डिमांड रखना दिमाग में यही रहता था। वह दिन अब वापस नहीं आ सकते। लेकिन अपने बड़े होते बच्चों के साथ रिश्तेदारों, पड़ोसियों के बच्चों को ईदी देकर जो सुकून खुशी मिलती, वह बचपन की खुशियों से कम नहीं।

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गुड्डे-गुड़िया खरीदना, झूलों का मजा

प्रगतिपुरम की डॉ. रुखसाना उस्मानी कहती है कि परिवार शिक्षा जगत से जुड़ा था। ईद का बचपन में बेसब्री से इंतज़ार रहता था। वो भी क्या दिन थे। ईदी मिलने का अपना-अलग मजा होता था। कोई रोक-टोक नहीं, मनमर्जी से मिली ईदी को सहेलियों के साथ खर्च करती थी। गुड्डे-गुड़िया खरीदना, झूलों का मजा लेना सब अभी भी याद आता है। घर की जिम्मेदारियों ने जकड़ा जरूर है। ईद पर बच्चों को मस्ती करते देखकर अपने दिन याद आ जाते हैं। काश वो बचपन की आजादी ईद पर फिर मिल जाती।

अब बच्चों को ईदी देकर मिलती है खुशी

अली मियां कालोनी की अंजुम परवीन कहती हैं कि सुबह-सुबह नए कपड़ों में वालिद, भाइयों के साथ ईदगाह जाना। नमाज के बाद बड़ों को सलाम करना। उनसे मिली ईदी को अपने छोटे बड़े भाई, बहनों और सहेलियों में सांझा करना। खिलौने खरीदना, चाट खाना, झूले झूलना खूब मस्ती करना आज भी याद आता है। अब अपने और आस पड़ोस के बच्चों को ईदी देकर वही खुशी मिलती है, जो कभी बचपन में हमको मिलने पर होती थी।

जिद के साथ मौजमस्ती के वो दिन

परशदेपुर की शाहजहां कहती है कि बचपन में ईद के वो दिन आज भी दिलों दिमाग मे ताजा है। लगता है जैसे कल की बात हो। नमाज के बाद जल्दी ईदी मिले और सहेलियों के साथ झुंड बनाकर हर तरह के झूले का लुत्फ उठाऊं। यही दिमाग में चलता रहता था। अब तो सिर्फ यादें ही हैं। जिद के साथ मौजमस्ती के वो दिन अब बच्चों की विरासत है।

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